रविवार, 27 दिसंबर 2015

शेर

दिन  गुजरते रहे हम सुधरते रहे तुझमे ढलते रहे
फकत मेरे मौला  हम इंसान ए दुरुस्त न हो पाये

शुक्रवार, 25 दिसंबर 2015

एक मुक्तक

जिस प्यार से
हमने सहेजा है
हर रंज दर्द आपका
वो कैसे दिखायें

जिस अपनेपन से
हमने संजोया है
हर स्वप्न आपका
वो कैसे बिसरायें

जिस खुशी से
हमने पी लिया है
हर अश्रु आपका
वो कैसे अब बहायें

जिस गहनता से
हमने जी लिया है
ये जीवन आपका
वो कैसे छोड़ जायें

अब जबकि
आपका सबकुछ
हमारा है
रंज दर्द अश्रु स्वप्न
जीवन तब हम
क्यू नहीं आपके

सोमवार, 14 सितंबर 2015

काश वो सब बिन कहे सुन लेता
कांटे मेरे दामन के चुन लेता
भर लेती उसे इन पलकों मे
वो काश मेरे सपने बुन लेता
वो शब्द  बनता मेरे वाक्यांशों का
या अंश बनता मेरे सारांशों का
भर लेती उसे लय छंदो मे
वो काश मेरी 'सरगम' होता

शुक्रवार, 11 सितंबर 2015

तेरी बेरुख़ी की इंतहां भी देखेंगे हम
तेरी  चौखट पर उम्र तलक बैठेंगे हम

रोक दे मेरी सांसे भी  तू हमकदम
फिर भी  तेरे साथ जिये जायेगें हम

प्यार तुझसे किया सबसे ज्यादा तो क्या
तेरे प्यार के बिना अब रह के देखेंगे हम

शायद कोई कमी थी मेरी कोशिशों मे ही
फिर एक बार तेरा हाथ थाम चल देंगे हम

सोमवार, 7 सितंबर 2015

कोई बेजुबां अन्दर है जो बोलना चाहता है
मगर बोले तो क्या बोले नादां नही जानता है

समंदर भर का पानी भी भिगा पाया न वो पत्थर
जो साहिल पर बहुत अरमान से भीगना चाहता है

चाहता है कि उसका दिल कभी अब उससे रुठे
मनाया औरों को है अब खुदको मनाना चाहता है

सिलवटें चादरों से उठके कब दिलों पर पङ गयीं
थोड़ा बहुत तो वो भी पागल जानता है

हर दुआ  के बदले जिसे अपयश मिला हो
वो रोज जीता है जो मरना चाहता है