सोमवार, 7 सितंबर 2015

कोई बेजुबां अन्दर है जो बोलना चाहता है
मगर बोले तो क्या बोले नादां नही जानता है

समंदर भर का पानी भी भिगा पाया न वो पत्थर
जो साहिल पर बहुत अरमान से भीगना चाहता है

चाहता है कि उसका दिल कभी अब उससे रुठे
मनाया औरों को है अब खुदको मनाना चाहता है

सिलवटें चादरों से उठके कब दिलों पर पङ गयीं
थोड़ा बहुत तो वो भी पागल जानता है

हर दुआ  के बदले जिसे अपयश मिला हो
वो रोज जीता है जो मरना चाहता है

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