काश वो सब बिन कहे सुन लेता
कांटे मेरे दामन के चुन लेता
भर लेती उसे इन पलकों मे
वो काश मेरे सपने बुन लेता
वो शब्द बनता मेरे वाक्यांशों का
या अंश बनता मेरे सारांशों का
भर लेती उसे लय छंदो मे
वो काश मेरी 'सरगम' होता
सोमवार, 14 सितंबर 2015
शुक्रवार, 11 सितंबर 2015
सोमवार, 7 सितंबर 2015
कोई बेजुबां अन्दर है जो बोलना चाहता है
मगर बोले तो क्या बोले नादां नही जानता है
समंदर भर का पानी भी भिगा पाया न वो पत्थर
जो साहिल पर बहुत अरमान से भीगना चाहता है
चाहता है कि उसका दिल कभी अब उससे रुठे
मनाया औरों को है अब खुदको मनाना चाहता है
सिलवटें चादरों से उठके कब दिलों पर पङ गयीं
थोड़ा बहुत तो वो भी पागल जानता है
हर दुआ के बदले जिसे अपयश मिला हो
वो रोज जीता है जो मरना चाहता है
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