बुधवार, 21 सितंबर 2016

मुझसे खफा है जिन्दगी कुछ जी लेते तो अच्छा था
साये मे हम अपने ही सिमट जाते तो अच्छा था

तेरी ऑंखो से छुपकर पी रहे हैं जाम उलफत का
कहीं यूं ही किसी दिन बहक जाते तो अच्छा था

वो कह गया बहुत कुछ , कुछ ना कहते कहते
खामोशियां कुछ मेरी वो सुन लेता तो अच्छा था

उनकी छोटी छोटी खुशियों पर कुर्बानहो गये हम
कभी जो हमको देख वो खुश होता तो अच्छा था

वो छोड़ देना चाहता है हाथ मेरा अब क्याहासिल
इस आज अभी मे हम मर जाते तो अच्छा था

मंगलवार, 5 अप्रैल 2016

थक गई है जिन्दगी अब मौत दे दो
हद की है शर्मिंदगी अब मौत दे दो

भर चुका है ये घड़ा अब सबर का
हो गया तैयार सामान कबर का
विष भरी हो गई सहर अब मौत दे दो

कोशिशें कामयाब न होंगी कभी अब
बाजुओं मे जान न होगी कभी अब
लहु मे घुल गया जहर अब मौत दे दो

बुधवार, 2 मार्च 2016

मुझे नीद नही आती कहीं कोइ तो सोया हाेगा
मुझे यादकर तकिये मे छुपकर रात भर रोया हाेगा

सिल लिये हैं होठ मैैने अब उम्रतलक के लिए
मेरे दर्द ओ जख्म पर कोई तो कुछ बोया हाेगा

आँख नम पलकों के पीछे छुप गए आँसू सभी
मेरी खुशियों के लिए भी कुछ कहीं पिरोया होगा

अमावस के रात सी काली हुई ये जिन्दगी
मेरे हिस्से का मेरा चाँद भी कहीं खोया होगा

आ गई किस मोड़ पे चलकर मैं तेरे साथ मे 

किसी और को तूने अपने ख्वाब में संजोया होगा

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2016

देखकर आँखों मे भी वो क्यूं नही समझ पाये
क्या कमजोर इतना मेरा प्यार था

हमने छोड़ा ये जहां था उनकी दो आँखों के लिये
जिनमें मेरे लिये बेइंतहा प्यार था

शोले बन जायेंगे राहों मे बिछे जो फूल थे
अपनी किस्मत पे मुझे ऐसा नही ऐतबार था

सो चुके हैं सब परिंदे दूर कहीं नीड़ में
जिनका कबसे मुझे इंतजार था

साथ मेरे हर सफर मे हमसफर तो तुम ही थे
फिर मेरा दिल ऐसे क्यूं बेजार था

शनिवार, 30 जनवरी 2016

दिल बैठ जाता है पलकों पे आंसू सूख जाते हैं
अब तो गम भी मुझे देखकर मुस्कराते हैं

सिकन चेहरे की छुपके बोझ बन सीने मे आ गई
हाथ दिल पे रखकर आज उसको बहलाते हैं

कोशिशें कैद होके रह गई हैं बन्द तालों मे
उम्मीदों के दरवाजे को अब भी खटखटाते हैं

तुम्हारी गलतियां हम देख लें ऐसे कहां काबिल
तुम्हारी गलतियों मे खुद को ही शर्मिंदा पाते हैं

मुकम्मल हों कभी मौला शायद हम भी एक दिन
यही खयाल लेकर जागते हैं और सो जाते हैं

जिन्दगी खेलती है खेल जाने क्यूं हमसे यूं
ख्वाब देखते हैं जो हकीकत मे खो जाते हैं

रविवार, 24 जनवरी 2016

हर दिन खुशी का है हर रात सुकून की होती है
जब आँख मे बचपन और दिल मे माँ होती है

समाज के तानों बानों से हर बन्दा है परेशां यहां
मै तो एक आजाद परिंदा हर दर्द से खुशी होती है

ये कोई है वो कोई है ये झंझट इनकी उनकी है
ये ऐसे वैसे जालों मे बंध जाने से घुटन होती है

गुरुवार, 14 जनवरी 2016

कभी-कभी यूं ही बिन बात रोने का मन करता है
तुम्हारे कंधे पर सर रख सोने का मन करता है

वो आम के पेङ वो तालाब वो मंदिर की सीढियां
उन पर बैठ जल का खेल देखने का मन करता है

सरसों खेतकी मेढी पे कभी तितली संग चलना
फिर बाली उम्र के सपने संजोने का मन करता है

झूले के खेल से गिरना वो तुम्हारा दूर से हंसना
वही हल्की सी चोट पर हंसने का मन करता है

काश कि जी लेते वो जीवन  फिर से मेरे मौला
फिर वो बेफ्रिक स्वछंद उङने का मन करता है

सोमवार, 11 जनवरी 2016

कुछ साथ लेकर आये थे जो सिर्फ़ तेरा था
नहीं नहीं वो दर्द नही प्यार मेरा बस तेरा था

सच है कुछ कर न सके सदा रहे नाकाम सनम
सब नाकामी मेरी सही पर हक तो मुझपे तेरा था

तुमने जो कहा हमसे हमने भी  बस वही किया
शायद वो छल था साथ हुआ नहीं जो होना था

अब तक इस आस मे जिंदा हूं कि जीलू ऐसे ही
क्या पता एक दिन मिल जाये वो हक जो मेरा था

मेरे हिस्से का आसमां मेरे पैरों की थोड़ी सी जमीं
मेरे हिस्से का प्यार तेरा जो मेरा था बस मेरा था

मंगलवार, 5 जनवरी 2016

कुछ मुखौटों मे यूं छुपी है जिंदगी कि
अपना चेहरा भी नज़र नहीं आता