दिन गुजरते रहे हम सुधरते रहे तुझमे ढलते रहे
फकत मेरे मौला हम इंसान ए दुरुस्त न हो पाये
रविवार, 27 दिसंबर 2015
शुक्रवार, 25 दिसंबर 2015
एक मुक्तक
जिस प्यार से
हमने सहेजा है
हर रंज दर्द आपका
वो कैसे दिखायें
जिस अपनेपन से
हमने संजोया है
हर स्वप्न आपका
वो कैसे बिसरायें
जिस खुशी से
हमने पी लिया है
हर अश्रु आपका
वो कैसे अब बहायें
जिस गहनता से
हमने जी लिया है
ये जीवन आपका
वो कैसे छोड़ जायें
अब जबकि
आपका सबकुछ
हमारा है
रंज दर्द अश्रु स्वप्न
जीवन तब हम
क्यू नहीं आपके
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