मंगलवार, 14 जुलाई 2020

मुक्तक


 सहज ही है किसी का रूठ जाना |
खिलके फूलों का फिर सूख जाना |
राह मिलती नही सुकूं की यूं ही -
पड़ता है उसके लिए भी कभी टूट जाना |

सफर कठिन है राह भी कांटो भरी |
दिन हैं कम जीवन है रातों भरी |
कुछ नहीं है जी लो जब तक जान -
कब निकल जाए ये उमर की चारों घरी |

मुक्तक



ये इंतज़ार  मेरे मौला कुछ ज्यादा ही हो गया |
उसके दर्द का आलम-ए-इरादा ही हो गया |
अर्जी तेरे दरबार में  थी लगाई उसने हर बार-
पर रहमगर वो तेरे हाथ का प्यादा ही हो गया |

तू देख तो सही कभी इन्सां की नजर से |
बच जा अगर बच सकता है अपनों के जहर से |
तू समझे क्या पीर उस दुखिया का सुन बता - 
जब लगती है कोई चोट इस छोटे से जिगर पे |

सब बंदे हैं तेरे ऐसा हम सुनते आये हैं |
तेरे दर पर बन सौदाई सजदा करते आये हैं |
अब कर दे रहम टूट गया है बाँध सब्र का -
तुझसे लेके ही जाएंगे जो अब लेने आये हैं |