मेरी अनुभूति - मेरी कविताएँ...
रविवार, 27 दिसंबर 2015
शेर
दिन गुजरते रहे हम सुधरते रहे तुझमे ढलते रहे
फकत मेरे मौला हम इंसान ए दुरुस्त न हो पाये
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