दिल बैठ जाता है पलकों पे आंसू सूख जाते हैं
अब तो गम भी मुझे देखकर मुस्कराते हैं
सिकन चेहरे की छुपके बोझ बन सीने मे आ गई
हाथ दिल पे रखकर आज उसको बहलाते हैं
कोशिशें कैद होके रह गई हैं बन्द तालों मे
उम्मीदों के दरवाजे को अब भी खटखटाते हैं
तुम्हारी गलतियां हम देख लें ऐसे कहां काबिल
तुम्हारी गलतियों मे खुद को ही शर्मिंदा पाते हैं
मुकम्मल हों कभी मौला शायद हम भी एक दिन
यही खयाल लेकर जागते हैं और सो जाते हैं
जिन्दगी खेलती है खेल जाने क्यूं हमसे यूं
ख्वाब देखते हैं जो हकीकत मे खो जाते हैं