मंगलवार, 5 अप्रैल 2016

थक गई है जिन्दगी अब मौत दे दो
हद की है शर्मिंदगी अब मौत दे दो

भर चुका है ये घड़ा अब सबर का
हो गया तैयार सामान कबर का
विष भरी हो गई सहर अब मौत दे दो

कोशिशें कामयाब न होंगी कभी अब
बाजुओं मे जान न होगी कभी अब
लहु मे घुल गया जहर अब मौत दे दो