कभी-कभी यूं ही बिन बात रोने का मन करता है
तुम्हारे कंधे पर सर रख सोने का मन करता है
वो आम के पेङ वो तालाब वो मंदिर की सीढियां
उन पर बैठ जल का खेल देखने का मन करता है
सरसों खेतकी मेढी पे कभी तितली संग चलना
फिर बाली उम्र के सपने संजोने का मन करता है
झूले के खेल से गिरना वो तुम्हारा दूर से हंसना
वही हल्की सी चोट पर हंसने का मन करता है
काश कि जी लेते वो जीवन फिर से मेरे मौला
फिर वो बेफ्रिक स्वछंद उङने का मन करता है
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